पंजाब-हरियाणा: खेतों से उठता दमघोंटू धुआं

दिल्ली से सटे पंजाब-हरियाणा और उत्तर प्रदेश में खेतों में आग लगाने की किसानों की मजबूरी क्या है.

इस बार भी अक्टूबर महीने का एक सामान्य दिन था जब दिल्ली में आसमान का रंग काफी धुंधला हो चुका था. दिल्ली के आम लोग रेस्तरां से लेकर अभिजात्य क्लबों के डाइनिंग रूम में बैठकर दिवाली पर पटाखा बिक्री प्रतिबंधित हो जाने की समस्या पर बात कर रहे थे. दिल्ली के बैठकखानों में इस तरह की बहस पहली बार नहीं हो रही थी. अमूमन हर साल अक्टूबर महीने में दिवाली के आस पास दिल्ली में वायु प्रदूषण का मुद्दा जोर पकड़ने लगता है. इस बार चर्चा का सुर थोड़ा ऊंचा था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली से एेन पहले पटाखों की बिक्री प्रतिबंधित कर दिया था.

दिल्ली की बिगड़ी हुई हवा का कोई एक खलनायक नहीं है. यहां लाखों की संख्या में सड़कों पर गाड़ियां भी इसमें योगदान देती हैं. इसके अलावा दिल्ली के पड़ोस में पंजाब-हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा खेतों में आग लगाने से निकलने वाले धुएं को मुख्य वजह बताया जाता है.

पिछले कई सालों से इस समस्या का समाधान क्यों नहीं निकल सका, यह समझने के लिये हमने पंजाब के कई इलाकों की यात्रा की. जब हम पंजाब पहुंचे तो ज़मीनी हकीकत कुछ और ही थी.

घोड़ा सिंह, पंजाब के चैना गांव से हैं. चैना फरीदकोट के जैतो तहसील में आता है. 40 साल के घोड़ा सिंह बचपन से खेती कर रहे हैं. वे बताते हैं, “पंजाब के किसानों के पास पराली खेतों में जलाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. पंजाब में भारी मशीन और रासायनिक खादों के अत्यधिक इस्तेमाल ने पहले ही खेती को घाटे का सौदा बना दिया है. किसान 100 रुपये लगाते हैं तो 80 रुपये वापस मिलता है. ऐसे में अगर किसान पराली को खेत में नहीं जलाते हैं तो उन्हें कम से कम 5000 रुपये प्रति एकड़ अतिरिक्त खर्च करना पड़ जाता है. किसान इस अतिरिक्त खर्च को वहन नहीं कर सकते.”

पंजाब-हरियाणा के खेती वाले इलाकों में दौरे के दौरान हमने पाया कि पराली यानी धान के फसल से पैदा होने वाली पुआल को प्राकृतिक तरीके से निपटा पाना बेहद खर्चे का सौदा है. जो काम पचास पैसे की माचिस से हो सकता है उसके लिए 5000 रुपए प्रति एकड़ का खर्च किसी को रास नहीं आएगा. वो भी तब जब खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है.

एनजीटी ने दिसंबर 2015 में पंजाब और हरियाणा सरकार को आदेश दिया था कि वे खेतों में आग लगाने के चलन पर रोक लगाये. कोर्ट ने कहा था कि अगले दो साल में किसानों को सुविधाएं देकर पराली जलाने के चलन को बंद किया जाये. इसमें किसानों को पराली को खेत में ही सड़ाने या उसे अलग करने वाली मशीनें उपलब्ध कराये जाने की बात थी. दो एकड़ से कम जमीन वाले किसानों को यह सुविधा मुफ्त में देने का विचार था. वहीं दो से पांच एकड़ जमीन वाले को 5000 तथा पांच एकड़ से ज्यादा के काश्तकार को 15000 रुपये में यह मशीन देना था.

लेकिन अदालत के इस फैसले को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका. फरीदकोट के चैना गांव में तमाम किसानों ने जो बात बताई उसका सार यह है- ‘इस तरह की मशीन हरेक गांव में होनी चाहिए, लेकिन एक मशीन एक गांव तो छोड़िए एक जिले में या एक प्रखंड में एक दिया गया है. अब उस एक मशीन से 10 प्रतिशत खेतों में भी पराली को नहीं हटाया जा सकता है.’ यानी पराली की मात्रा के मुकाबले संसाधन बेहद सीमित हैं.

एनजीटी ने यह भी आदेश दिया था कि किसानों को बाजार के साथ कनेक्ट किया जाए, जिससे कि वे पराली को बायोमास आधारित पावर प्लांट और दूसरे कामों के लिये इस्तेमाल कर सके. लेकिन पंजाब के किसानों की मानें तो यह योजना ज्यादातर जगहों पर शुरू ही नहीं हो सकी है.

इसी साल अक्टूबर में एनजीटी ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पंजाब सरकार को फटकार लगायी. जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाले बेंच ने सरकार से पूछा कि दो साल बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार क्यों नहीं हुआ है. कोर्ट ने कहा, ‘हमने दो साल तक अपने आदेश के पालन होने का इंतजार किया. अब तक आपने क्या हासिल किया? क्या आप एक भी ऐसे किसान को हमारे सामने ला सकते हैं जो आपके किए प्रयासों से संतुष्ट है?’

वहीं दूसरी तरफ पंजाब सरकार फंड न होने का दावा कर रही है. पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने मीडिया में बयान दिया है, ‘हमारे पास पैसे नहीं हैं. हमने तीन साल के लिये 2000 करोड़ सालाना के हिसाब से केन्द्र सरकार से फंड की मांग की है. भारत सरकार को इस संबंध में फैसला लेना है.’

फिलहाल पंजाब सरकार खेत में आग लगाने वाले किसानों पर जुर्माना लगा रही है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अब तक 500 किसानों पर जुर्माना लगाया गया है. इससे किसानों में डर का माहौल बन गया है. पूरे पंजाब के किसान या तो डरे हुए हैं या आंदोलित हैं. किसान यूनियन और राजनीतिक पार्टियां किसानों को खेत जलाने के लिये प्रोत्साहित कर रहे हैं. सैकड़ों किसानों की टोली बनाकर पराली को जलाने का काम किया जा रहा है. लेकिन मूल सवाल पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है. किसान यूनियन अतिरिक्त बोनस और सब्सिडी की मांग कर रहे हैं जिससे कि वे पराली जलाना बंद कर सके.

बठिंडा से पटियाला जाने के रास्ते में संगरुर के आसपास हमें हाईवे से थोड़ी दूरी पर जलते हुए खेतों की श्रृंखला दिखी. जंग सिंह अपने खेत में पराली जला रहे थे. जब हमने उनसे इस बाबत बात करने की कोशिश की तो कैमरा देखकर वो बात करने से हिचकिचा गए. बाद में कैमरा हटाने पर वो बात करने को तैयार हुए, “पंजाब के किसान मजबूरी में आग लगाते हैं. हम जानते हैं कि इसे जलाने से हमारी हवा ज़हरीली हो रही है, हमारे बच्चे बीमार हो रहे हैं, किसानों को सांस लेने में तकलीफ़ हो रही है. अस्थमा जैसी बीमारी हमारे गांवों में भी फैल रही है. हमें भी साफ हवा चाहिए. सरकार को चाहिए कि जुर्माना लगाने की बजाय पराली न जलाने का वैकल्पिक व्यवस्था करे, कोई नयी तकनीक, किसानों को बोनस आदि देना चाहिए. यह समझने की जरुरत है कि इस समस्या से सरकार ही निजात दिला पायेगी, किसान चाहकर भी इसका समाधान नहीं निकाल सकते.”

पंजाब की खतरनाक हवा से दिल्ली का फूला दम

पंजाब के खेतों में पराली जलाने से दिल्ली की ही हवा खराब नहीं हो रही, बल्कि पंजाब में भी स्थिति लगातार खतरनाक बनी हुई है. पिछले साल विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से जारी दुनिया के 25 सबसे प्रदूषित शहरों में चार शहर पंजाब के थे. प्रदूषित हवा के चलते पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों को घर में रहने की सलाह देता रहता है और किसानों से पराली नहीं जलाने का आग्रह भी करता रहता है.

भारतीय किसान यूनियन (डकौंडा ग्रुप) के राज्य महासचिव जगमोहन सिंह बताते हैं, “सिर्फ पटियाला में इस बार पराली जलाने के क्रम में पांच किसान अब तक झुलस चुके हैं. किसानों के बीच छाती में जलन, सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं आम हो चुकी हैं. हमें यह समझना होगा कि जब वायु प्रदूषण की बात होती है तो सिर्फ दिल्ली में हवा खराब नहीं है बल्कि पंजाब के गांव भी उतने ही प्रभावित हैं.”

जगमोहन सिंह पराली जलाने और धान की खेती करने की मजबूरी के बारे में बताते हैं. वे कहते हैं, “किसानों को सरसों, गन्ना, आलू जैसी फसलों का न्यूनतम खरीद मूल्य के हिसाब से सही कीमत नहीं मिल पाती है. इसलिए किसान धान की खेती करने को मजबूर हैं क्योंकि धान और गेंहू की खेती में किसानों को सरकारी कीमत आमतौर पर मिल जाती है.”

जगमोहन आगे कहते हैं, “हमें यह समझना होगा कि पराली जलाने और खराब हवा की जिम्मेदारी सारे समाज की है, सिर्फ किसानों के मत्थे इसे नहीं मढ़ा जा सकता है. हम में से कोई भी खेत में आग लगाने के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन पहले से ही बहुत कम लाभ में खेती कर रहे किसानों को अगर सरकार सब्सिडी नहीं देती है तो किसानों के पास दूसरा और क्या विकल्प है? पराली न जलाने की वैकल्पिक व्यवस्था में यदि खर्च बढ़ रहा है तो फिर सरकारी खरीद मूल्य की कीमत क्यों नहीं बढ़ायी जाती.”

हमने पाया कि कुछ-कुछ जगहों पर पराली से बिजली बनाने के प्लांट भी लगे हुए हैं, लेकिन ज्यादातर या तो बंद हैं या सभी क्षेत्रों तक उनकी पहुंच नहीं है.

पटियाला में रहने वाले डा. अमर सिंह आजाद रिटायर्ड डॉक्टर हैं और काफी समय से इस समस्या को देख रहे हैं, वे बताते हैं, “इन दिनों पराली जलाने की वजह से अस्थमा और सांस संबंधी बीमारियां बढ़ने लगती हैं.”

डा. आजाद कहते हैं, “पराली जलाने पर बहुत हल्ला किया जाता है. किसानों को दोषी ठहराना आसान है. लेकिन यह समझने की जरुरत है कि वायु प्रदूषण के दूसरे स्रोत इससे कहीं ज्यादा बर्बादी कर रहे हैं. खेत में आग तो सिर्फ पन्द्रह दिन के लिये लगाई जाती है जबकि थर्मल पावर प्लांट, रियल इस्टेट कंस्ट्रक्शन, गाड़ियों और औद्योगिक प्लांट से निकलने वाला प्रदूषण तो बारहो मास प्रदूषण फैलाता रहता है. उस पर लगाम लगाने के लिये कई स्तरों पर गंभीर कोशिश करने की जरुरत है.”

आजाद आगे बताते हैं कि वायु प्रदूषण के साथ-साथ पराली जलाने से मिट्टी खराब हो रही है, पंजाब का पानी भी प्रदूषित हो चुका है. हमें इन सभी प्रदूषण से छुटकारा पाना होगा.

वायु प्रदूषण पर कई सालों से काम कर रहे ग्रीनपीस के सीनियर कैंपेनर सुनिल दहिया बताते हैं, “ऐसा नहीं है कि किसान पराली जलाने से होने वाले नुकसान को नहीं समझ रहे. वे भी अपने और परिवार के स्वास्थ्य के लिये चिंतित हैं और इस समस्या से निजात पाना चाहते हैं. ऐसे में सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो किसानों को जागरुक करने के साथ-साथ बेहतर वैकल्पिक सुविधा और संसाधन मुहैया कराये.”

This article first appeared in Newslaundry (Hindi)

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